जनसुनवाई पोर्टल बना मजाक खंड विकास अधिकारी व परियोजना अधिकारी ने ग्रामपंचायत अधिकारी से मिलकर उड़ाई धज्जिया

उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय(दैनिक कर्मभूमि) चित्रकूट। उत्तर प्रदेश सरकर ने पोर्टल बनाया हुआ है, जिसका नाम ‘जनसुनवाई’ पोर्टल है। इसका उद्देश्य यह है कि उत्तर प्रदेश के लोग अपनी शिकायत अथवा सुझाव इस पोर्टल पर ऑनलाइन दर्ज करें और उसे सम्बंधित अधिकारी व सम्बंधित विभाग को भेजकर उसका निस्‍तारण किया जाय।

पूर्व की सरकार में तो इस पोर्टल पर मजाक चल ही रहा था। पर इस सरकार से लोगों की उम्मीदें कुछ ज्यादा ही बढ़ गयीं थी और आमजनता की समस्या का आसानी से न्याय एवम समस्या का समाधान हेतु इसे और भी बेहतर बानने के साथ साथ 1076 टोल फ्री मुख्यमंत्री हेल्पलाइन योजना की शुरुवात भी की गई लेकिन ये सब सुविधाएं तानाशाह अधिकारियों की कार्यशैली ने मजाक बनाकर रख दिये । वंही मुख्यमत्री योगी आदित्यनाथ भी लोगों की अपेछाओं पर खरा उतरने का हर संभव प्रयास निरन्तर कर रहे हैं। उन्होंने अधिकारियों और मंत्रियों सभी को निर्देश दिए हैं कि कोई भी फाइल किसी भी टेबल पर तीन दिन से अधिक नहीं रुकनी चहिये। यह होने भी लगा। परन्तु अफसरशाही और लालफीता शाही को कौन दुरुस्त करे? यह आसान काम नहीं है। आखिर पुरानी व्यवस्थाओं में रचे बसे लोग इतनी जल्दी सुधरने का नाम तो ले नहीं सकते।

जितनी भी जनसुनवाई पोर्टल पर जनता द्वारा शिकायत भेजी जाती है, अफसरों द्वारा उनमें कमी निकलने का भरपूर प्रयास किया जाता है। जनता द्वारा भेजा गया आवेदन बस जनता से अधिकारी के आॅफिस और अधिकारी के आॅफिस से वापस जनता के पास निस्तारित लिखकर भेजा जा रहा है।

निस्तारित का वास्तविक अर्थ यह होता है कि समस्‍या का समाधान हो चुका है। पर यहाँ (जनसुनवाई पोर्टल पर) निस्तारित का अर्थ है कि अधिकारी या सम्बंधित विभाग द्वारा उस आवेदन पर कोई न कोई बहाना बनाकर वापस जस का तस फर्जी झूठी रिपोर्ट लगाकर आवेदनकर्ता के पास भेज दिया जाए । कई बार तो आवेदन केवल सरसरी निगाह से ही पढ़े जाते हैं और उसमें क्या लिखा है यह भी सम्बंधित विभाग नहीं जानता। कुछ भी उल्टा-सीधा तर्क देकर वापस आवेदनकर्ता के पास निस्तारित लिखकर भेज दिया जाता है।

प्रार्थी अशोक कुमार निवासी ग्रामपंचायत बंदरी द्वारा बताया गया कि मैं जनसुनवाई पोर्टल पर पिछले छः महीने से एक प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के लिए आवेदन कर रहा हूँ। पर वहां से हर तीसरे दिन निस्तारित लिखकर वापस आवेदन भेज दिया जाता है, जिसमे कुछ समय तक पिता को बृहद किसान बताकर निस्तारण किया जाता रहा जबकि विभाग को पता चला कि पिता आवेदनकर्ता के काफी पहले इस दुनिया मे नही है अब मोटरसाइकल का निस्तारण में हवाला दिया जाने लगा । लेकिन जब प्रार्थी द्वारा नमो एप के माध्यम से प्रधानमंत्री जी से अपने इस तरह जिम्मेदार अधिकारी द्वारा जनसुनवाई पोर्टल को मजाक बनाने की बात रखी साथ ही निस्तारण में आये दो पहिया का रजिस्टेशन क्रमांक माँगा गया तो खंड विकास अधिकारी व जांच करता ग्रामपंचायत अधिकारी बंदरी द्वारा दो पहिया का हवाला छोड़कर अब प्रार्थी के पास पक्का मकान बनने का हवाला दिया जाने लगा । लेकिन प्रार्थी के समस्या का आज तक समाधान नहीं हुआ न ही किसी जिम्मेदार ने आजतक ऐसे गैराना जिम्मेदारी रिपोर्ट लगाने वाले अधिकारी पर कोई कार्यवाही की जबकि प्रार्थी द्वारा लगातार मुख्यमंत्री हेल्प लाइन से फीडबैक लिया जाता रहा । इतना ही नही शिकायत निस्तारण में ऐसे-ऐसे तर्क दिए गए हैं, जिसको यदि कोर्ट में पेश कर दिया जाय, तो शायद सम्बंधित उच्चाधिकारियों की शामत आ जाए।

वंही मुख्यमंत्री के ई-मेल की भी यही दशा है। उस पर भेजी गई किसी भी समस्‍या की सुनवाई तक नहीं होती, न ही उसका कोई जवाब आता है। जबकि वर्तमान सरकार द्वारा कई गंभीर समस्‍याओं का निस्‍तारण केवल ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल साइट्स के माध्यम से तत्काल हो गया। मगर यहाँ (मुख्यमंत्री के) मेल पर भेजी गयी सूचना की कोई सुनवाई नहीं होती है।

जब बड़ी और छोटी कंपनियां अपने बड़े ग्राहक नेटवर्क के लिए काॅल सेंटर बना सकती हैं, जिस पर कि समास्‍या का हल तुरंत होता है, तो सरकार भी इस प्रकार का कार्य आखिर क्यों नही कर सकती है। सरकार को भी इस प्रकार की कोई न कोई व्यवस्था बनानी होगी, तभी जाकर सुशासन के लक्ष्‍य को हासिल किया जा सकेगा। अन्यथा यदि ऐसा ही चलता रहा, तो जिस प्रकार से आज “जनसुनवाई” पोर्टल और ई-मेल पर जनता का समय और उम्मीद दोनों बर्बाद हो रही है, इस प्रकार तो जनसुनवाई पोर्टल और ई-मेल द्वारा की जाने वाली शिकायत के तंत्र से लोगों का विश्‍वास ही उठ जाएगा।

प्रदेश बहुत बड़ा है और अधिकारी इतनी जल्दी संवेदनशील होने वाले नहीं हैं। जनसुनवाई और प्रदेश की जनता की समस्‍या का निवारण केवल अधिकारियों पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इस कार्य में सम्बंधित मंन्त्रालय या अन्य कोई सार्थक व्यवस्था की तत्काल आवश्यकता है। अतः मुख्यमंत्री को चाहिए की हर जनसुनवाई पर आवेदनकर्ता के पास वापस फ़ोन द्वारा यह पूछा जाय कि उसकी समस्‍या हल हुई या नहीं? साथ ही यदि जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा अपने पद का दुरुपयोग कर गैरजिम्मेदारी से झूठी रिपोर्ट लगाकर शिकायत का निस्तारण करते है तो तत्काल अधिकारी के खिलाफ नोटिस जारी होने का प्रवधान होना चाहिए ताकि इन कदमों से जनता का भरोसा जीतने में सरकार को मदद मिलती रहे ।

 

*ब्यूरो रिपोर्ट* अश्विनी कुमार श्रीवास्तव

*जनपद* चित्रकूट

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