उत्तर प्रदेश ( राष्ट्रीय दैनिक कर्मभूमि) जौनपुर
अन्ना के बाद वांगचुक: क्या बदल रही है राजनीति की धारा?
युवा आक्रोश की नई इबारत लिखता जंतर-मंतर
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भारतीय लोकतंत्र में कुछ आंदोलन केवल अपनी मांगों के कारण नहीं, बल्कि अपने प्रभाव के कारण इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। वर्ष 2011 का अन्ना हज़ारे आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ वह जनआंदोलन धीरे-धीरे एक राजनीतिक धारा में बदला और अंततः उससे आम आदमी पार्टी का उदय हुआ। उस आंदोलन ने यह साबित किया कि जब जनता, विशेषकर युवा वर्ग, किसी मुद्दे से भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है तो उसका प्रभाव केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राजनीति की दिशा भी बदल सकता है।
भूख हड़ताल का 19वां दिन :
दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन आज इसी कारण गंभीर चर्चा का विषय बन गया है। आंदोलन के उन्नीसवें दिन तक पहुँचते-पहुँचते यह केवल लद्दाख के संवैधानिक अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय पहचान का प्रश्न नहीं रह गया है। अब यह मंच देशभर के युवाओं की चिंताओं का भी प्रतीक बनता दिखाई दे रहा है। नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, बेरोज़गारी, शिक्षा व्यवस्था में विश्वास और युवाओं के भविष्य जैसे प्रश्न आंदोलन के केंद्र में आ गए हैं। यही कारण है कि जंतर-मंतर पर सबसे अधिक संख्या छात्रों और युवाओं की दिखाई दे रही है।
सरकार मौन:
युवाओं की यह भागीदारी संयोग नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगाने वाले लाखों अभ्यर्थियों के लिए हर परीक्षा केवल एक अवसर नहीं, बल्कि उनके जीवन का निर्णायक पड़ाव होती है। जब किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से व्यापक रूप लेता है। सरकार मौन क्यों है यह समझ से परे है। इससे विपक्ष और आम आदमी पार्टी समाजवादी पार्टी जैसे लोगों को नया मुद्दा मिल गया। इससे जुलाई में चलने वाला संसद सत्र हंगामेदार बन जाएगा।
विपक्ष को मिला महत्वपूर्ण मुद्दा :
आंदोलन के साथ विपक्षी दलों की सक्रियता भी लगातार बढ़ रही है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, सांसद डिंपल यादव, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह, आज़ाद समाज पार्टी के प्रमुख एवं सांसद चंद्रशेखर आज़ाद सहित कई विपक्षी नेता आंदोलन स्थल पर पहुँच चुके हैं या समर्थन जता चुके हैं। किसान संगठनों, छात्र संगठनों और विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी ने आंदोलन को और व्यापक स्वरूप दिया है। 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च इसी बढ़ते जनसमर्थन का अगला चरण माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब एक नया प्रश्न उठ रहा है—क्या यह आंदोलन भी भविष्य में किसी नए राजनीतिक विकल्प की पृष्ठभूमि बन सकता है, जैसा अन्ना आंदोलन के बाद हुआ था? इसका कोई निश्चित उत्तर अभी नहीं है। सोनम वांगचुक ने स्वयं अपनी पहचान एक शिक्षा सुधारक, पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक चिंतक के रूप में बनाई है, न कि राजनीतिक नेता के रूप में। फिर भी भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि बड़े जनआंदोलन कई बार नई राजनीतिक शक्तियों के उदय का आधार बन जाते हैं। इसलिए इस संभावना पर चर्चा स्वाभाविक है, लेकिन इसे वर्तमान समय में तथ्य नहीं माना जा सकता।
भूख हड़ताल को मिला जन समर्थन :
सोनम वांगचुक की लोकप्रियता अचानक नहीं बढ़ी। वर्षों से लद्दाख में शिक्षा, नवाचार, सौर ऊर्जा, जल संरक्षण और हिमालयी पर्यावरण पर उनके कार्य ने उन्हें विश्वसनीय सार्वजनिक व्यक्तित्व बनाया। जब उन्होंने युवाओं, पर्यावरण और लोकतांत्रिक भागीदारी जैसे व्यापक मुद्दों को एक साथ जोड़ा, तो उनका संदेश लद्दाख से निकलकर पूरे देश तक पहुँच गया। उनकी शांत, अहिंसक और संवाद आधारित शैली ने भी उन्हें व्यापक स्वीकार्यता दिलाई।
आगे की रणनीति दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण होगी। आंदोलनकारी संसद मार्च के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात और अधिक मजबूती से रखना चाहते हैं। दूसरी ओर सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ संवाद का रास्ता खुला रखने की चुनौती होगी। लोकतंत्र में किसी भी जनआंदोलन की वास्तविक सफलता टकराव से नहीं, बल्कि सार्थक संवाद और नीतिगत समाधान से तय होती है।
युवा आंदोलन का दिखता असर:
आज जंतर-मंतर पर खड़ा युवा केवल किसी एक क्षेत्र की लड़ाई नहीं लड़ रहा, बल्कि वह निष्पक्ष परीक्षाओं, पारदर्शी व्यवस्था, पर्यावरणीय संतुलन और जवाबदेह शासन की मांग कर रहा है। आने वाले दिनों में यह आंदोलन भारतीय राजनीति में केवल एक विरोध प्रदर्शन बनकर रह जाएगा या अन्ना आंदोलन की तरह कोई नई सामाजिक-राजनीतिक दिशा देगा—इसका उत्तर भविष्य देगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि जंतर-मंतर से उठी यह आवाज़ देश की लोकतांत्रिक चेतना में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है।
सरकार के सामने चुनौती और अवसर
जंतर-मंतर का आंदोलन अब केवल विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि सरकार के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक परीक्षा भी बन गया है। यदि सरकार इसे केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानकर देखेगी, तो विपक्ष को इसे जनआंदोलन के रूप में और अधिक विस्तार देने का अवसर मिल सकता है। लेकिन यदि सरकार समय रहते संवाद की पहल करे, सोनम वांगचुक और प्रतिनिधिमंडल को वार्ता के लिए आमंत्रित करे, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, युवाओं के रोजगार तथा लद्दाख से जुड़े मुद्दों पर समयबद्ध रोडमैप प्रस्तुत करे, तो आंदोलन की तीव्रता स्वाभाविक रूप से कम हो सकती है।
राजनीतिक दृष्टि से विपक्ष की रणनीति सरकार को रक्षात्मक स्थिति में लाना और युवाओं की नाराज़गी को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना है। इसका उत्तर टकराव नहीं, बल्कि विश्वास निर्माण हो सकता है। यदि सरकार ठोस घोषणाएँ, स्पष्ट समय-सीमा और संवाद की प्रक्रिया शुरू करती है, तो विपक्ष के लिए आंदोलन को केवल राजनीतिक मुद्दा बनाए रखना कठिन हो सकता है।
लोकतंत्र में आंदोलनों का स्थायी समाधान बल प्रयोग या टकराव से नहीं, बल्कि संवेदनशील संवाद और नीति-निर्णयों से निकलता है। यही वह रास्ता है जिससे सरकार अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता भी बनाए रख सकती है और युवाओं के विश्वास को भी मजबूत कर सकती है। संसद मार्च हो या न हो, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आंदोलन के मूल प्रश्नों पर सार्थक बातचीत आगे बढ़े।
डॉ सुनील कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर, जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर