हमारी स्वतंत्रता आज प्रासंगिक है !

उत्तर प्रदेश ( दैनिक कर्मभूमि) जौनपुर

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15 अगस्त 2020 को हम भारत के 74वें स्वतंत्रता दिवस में सम्मिलित है । हम लोकतंत्र वाले राष्ट्र में अपने मूल्यों और अधिकारों का जमकर दुरुपयोग भी करते है । यूं तो आजादी हमें बहुत कुछ भुगत कर मिली है , कई वीर सपूतों के बलिदान का फल है ये स्वतंत्रता । हमने अपनी स्वतंत्रता का उपयोग सही दिशा में किया या नहीं ये अब भी यक्ष प्रश्न है । बात चाहे 1857 की क्रांति ( वीर शहीद मंगल पांडे द्वारा दिया गया सर्वोच्च बलिदान ) की करे या जलियांवाला बाग मे अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में जमे हजारों भारतीय स्वतंत्रता इंकलाबियों पर क्रूर जनरल द्वारा गोलियां चलवाकर भुने जाने की हो ! ये आजादी बहुत बड़ी क़ीमत चुकाकर मिली है हमें । जलियांवाला में 1000 के करीब लोग शहीद हो गए थे! सभी जाति, धर्म तथा सम्प्रदाय के लोगो के बलिदान के कारण देश को 90 वर्ष ( 1857 -1947 )के बाद आजादी हासिल हुई थी! वह भी बंटवारा के रूप मे! इस लिए यह कहना कि बंटवारा के लिए अमुक व्यक्ति, वर्ग, सम्प्रदाय, जाति जिम्मेदार है! जंगे आजादी के आंदोलन मे सबकी भागीदारी रही थी!
देश में बटवारें की राजनीति करने वाले तब भी थे ,अब भी है । उस समय भी ईश्वर अल्लाह करके लोगो सांप्रदायिक दंगो के भेंट चढ़ाया गया आज भी बैंगलोर और हैदराबाद में वहीं मंजर देखने को मिलता है । विरोध तथा फुट डालने वाले उस समय भी थे! परन्तु उनकी संख्या तब नगण्य थी! देश की आजादी के बाद मे भी अभी तक भी देश के विभाजन के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते है! यह उचित नही है! उस समय की परिस्थिति के अनुसार सम सामयिक ,उचित निर्णय लिये गये थे! उस समय के लोगो ने बिना किसी स्वार्थ के आंदोलन मे भाग लिया! न घर परिवार की चिंता, न ही रूपये पैसे कमाई की चिंता की सिर्फ एक ही जुनून तथा लक्ष्य था कि येन केन प्रकारेण मुल्क को आजाद कराना था! परन्तु आजादी के बाद की जनता मात्र प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है! जो किसी भी परिस्थिति मे उचित नही है! यह देश सबका है! किसी भी वर्ग तथा सम्प्रदाय को कटघरे मे खड़ा करने की कोशिश ठीक नही है ।इस स्वतंत्र भार‍त में बातें तो हम स्वतंत्रता की बहुत करते हैं चाहे बात आरक्षण की हो चाहे दलित उत्पीड़न की । बात हरियाणा के खाप पंचायत की हो, या फिर हर रोज छोटी-बड़ी बालिकाओं, युवतियों या सरेराह छेड़छाड़ की शिकार होने वाली महिलाओं की हो। धनलोभियों द्वारा दहेज के लिए दी जाने वाली नारियों की बलि की हो, उन्हें टॉर्चर करना, मारना-काटना, जलाना- ये सब भार‍त के आम परिदृश्य हैं। यहां तक कि उन्हें आत्महत्या जितना बड़ा घा‍तक कदम उठाने के लिए मजबूर करना और समाज को यह दिखाया जाना कि वह अपनी जिंदगी से परेशान थी इसलिए उसने इतना बड़ा कदम उठाया है। कहीं भी नजरें उठाकर देख लीजिए इसमें स्वतंत्रता कहां दिखाई पड़ रही है?
आज के इस बदलते युग में एक ओर जहां युवतियां/नारियां हर मामले में पुरुषों की बराबरी कर रह‍ी हैं, वहीं आज भी कई घर ऐसे हैं जिसमें नारियों की वह बराबरी पुरुषों को, उनके घर वालों को रास नहीं आती। आज भी महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में कोई कमी नहीं आई है। आज भी भार‍‍त में दंगे-फसाद होते ही रहते हैं। कई आतंकवादी संगठन गलत चीजों का इस्तेमाल करके भार‍त और उसकी स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते रहते हैं। इससे कई घर, कई परिवार, कई गांव-कस्बे, कितने ही इंसान तबाह हो रहे हैं।आज भी स्वतंत्र भार‍त पर एक प्रश्नचिह्न लगा हुआ है! अगर सचमुच भारत देश स्वतंत्र है, आजाद है तो फिर उस आजादी की, उस स्वतंत्रता की सही मायने में क्या परिभाषा होनी चाहिए, यह आम आदमी की सोच से परे है। स्वतंत्रता का अर्थ यह कतई नहीं है कि स्वच्छंद होकर मनमानी की जाए। अपनी मर्यादा को भूलकर सरेआम अनैतिक कृत्य किए जाएं। देश के सभी लोग स्वतंत्रता का सही-सही आशय समझें। नेता वर्ग और आम जनता भी अपनी सीमाएं खुद तय करें। पराए बेटा-बेटी को भी दिल से अपना मानें। क्या सही क्या गलत- यह करने से पूर्व सोचें तभी स्वतंत्रता का असली आनंद उठाया जा सकता है। और फिर तब हम गर्व से कह सकेंगे कि ‘हम भारतीय होने के साथ-साथ स्वतंत्र भी हैं।’स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र देशवासियों को मेरा शत्-शत् नमन…!जय हिन्द!
_______ पंकज कुमार मिश्रा ( राजनीतिक विश्लेषक एवं स्वतंत्र पत्रकार 8808113709)