हास्य नाटक खुदा खै़र करे का सफल मंचन

उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय (दैनिक कर्मभूमि) लखनऊ,19 फरवरी 2021 सुप्रसिद्ध नाट्य संस्था नौशाद संगीत डेवलपमेन्ट सोसाइटी द्वारा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय संस्कृति विभाग नई दिल्ली के सहयोग से मूल नाट्य रचना आत्मा राम सांवत तथा हिन्दी नाट्य रूपान्तरण श्रीधर जोशी द्वारा रूपान्तरण खुदा खै़र करे का नाट्य मंचन नगर के वरिष्ठ रंग निर्देशक हसन काजमी के कुशल निर्देशन में बाल्मिकी सभागार में सांयकाल 06ः30 बजे उ0प्र0 संगीत नाटक अकादमी परिसर में मंचित किया गया। नाटक का उद्घाटन एवं दीप प्रज्जवलन भूतपूर्व प्रमुख सचिव आईएएस अनीस अंसारी ने किया एंव विशिष्ट अतिथि के रूप में शिराज मेंहदी पूर्व एमएलसी ने कलाकारो को आर्शीवाद प्रदान किया। मंचन से पूर्व मुख्य अतिथि अनीस अंसारी ने (नौशाद सम्मान अलंकरण समारोह-2020) के अन्तर्गत नगर के वरिष्ठ रंग कर्मी विजय वास्तव, सुप्रसिद्ध फिल्म के अभिनेता एवं दर्पण थियेटर के सचिव डॉ0 अनिल रस्तोगी, लखनऊ के वरिष्ठतम रंग निर्देशक एवं लोक कथा पर आधारित रंग निर्देशक राजा अवस्थी एवं नवाब ज़ाफर मीर अब्दुल्लाह तथा नगर की सुप्रसिद्ध नाट्य संस्था आंकाक्षा थियेटर आर्ट्स के प्रभात कुमार बोस, संस्थापक,निर्देशक एवं वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता बी0एन0 ओझा को अलंकृत किया गया। तदोपरान्त मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथि द्वारा प्रश्नगत समस्त कलाकारों को आर्शीवाद प्रदान किया गया। नाटक के कथानक के अनुसार आत्मा राम सांवत की मूल नाट्य रचना एवं श्रीधर जोशी द्वारा रूपान्तरित प्रस्तुत नाट्य कृति का नायक शराफत हुसैन जोकि वास्तव में एक विवाहित और दूसरे शहर में नौकरी करने आया है। उस शहर में किराये का मकान ढूढ़ते हुए एक ऐसा मकान किराये पर लेता है जहां का मकान मालिक नवाब साहब (बड़े हुजुर) की शर्तों के अनुसार जो कुंवारा व्यक्ति होगा उसी को मकान में किरायेदार के तौर पर रहने दिया जायेगा। बड़े हुजुर की एक बेटी जिसका नाम पम्मी है शादी करके बड़े हुजुर उसे अपना घर जमाई बनाना चाहता है। शराफत मियाँ अपने आप को कुंवारा बताकर उस मकान में रहने लगता है। लेकिन एक दिन शराफत मियां की पत्नी शमीम जो उस शहर में अपने पति शराफत का पता लगाते हुए आ जाती है। शराफत मियां की बीबी को इस झूठ का पता नहीं रहता बस मुसीबत यहीं से शुरू हो जाती है एक ओर मकान मालिक से मकान खाली कराये जाने का डर से शराफत मियां अपनी बाबी को आपा (बहन) के रूप में मकान मालिक बड़े हुजुर से परिचय कराता है। तो दूसरी ओर बड़े हुजुर मन ही मन पम्मी की शादी शराफत हुसैन से कराने की सोचता है। तब बड़े हुजुर जो स्वयं विदुर है। शमीम पर आशिक हो जाते है और उससे शादी करने का सपना देखते है। कई दिलचस्प घटनाओं के बाद शमीम अब्बू (पिता) मीर साहब अपने बेटे इमरान मियां के साथ वहां आ धमकते है। अन्त में बड़े ही
नाटकीय परिस्थितियों में सम्पूर्ण घटना का रहस्योद्घाटन होता है। एक दिलचस्प मोड़ पर आकर नाटक समाप्त हो जाता है। नाटक में शराफत हुसैन की प्रधान भूमिका में अशोक लाल, मिठ्ठू मियां की भूमिका में शेखर पाण्डेय, बडे़ हुजुर की भूमिका में विजय मिश्रा, शमीम की भूमिका में सुश्री श्रद्धा बोस, मीर साहब शमीम के वालिद भूमिका में आनन्द प्रकाश शर्मा, पम्मी की भूमिका में सोनाली बाल्मिकी, नाना-मामा की भूमिका में गिरीश अभीष्ट तथा घरेलू नौकर कलाकारों ने रंगदर्शको को ठहाके लगाने पर मजबूर कर दिया। सेट परिकल्पना चन्द्रानी मुखर्जी, तथा सेट निर्माण कैलाश काण्डपाल, मोहम्मद हामिद तथा मोहम्मद राशिद का था। रूपसज्जा सभ्यता भारती, सलमा बानो था। वस्त्र विन्याश कौसर जहाँ का था। प्रस्तुति नियंत्रक अब्दुल मारूफ और अनवर हुसैन का था। प्रेक्षागृह नियंत्रक कमर सुल्ताना और चौधरी यहया का था। नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला एवं मंच प्रस्तुतिकरण परिकल्पना अतहर नबी का था। सम्पूर्ण परिकल्पना एंव निर्देशन हसन काज़मी का था। कुल मिलाकर मकान की विकट समस्या को उजागर करता नाटक खुदा खै़र करे दर्शको पर बहुत अच्छा प्रभाव छोड़ता है।

रिपोर्टर सिद्धार्थ त्रिवेदी रायबरेली