क्या सचमुच कानपुर देहात एक चारागाह ;? एक ज्वलंत सवाल, बृजभूषण सिंह परिहार अकेला

उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय (दैनिक कर्मभूमि)  कानपुर देहात के एक राजनीतिक दल के भाग्य विधाता ने अपने ही सहकर्मी भाग्य विधाताओं पर एक बहुत बड़ा आरोप मढ़ दिया कि इस जनपद के चारों विधानसभा सदस्यों के लिए कानपुर देहात की पावन सरजमीं एक चारागाह की तरह है।जिसे वह ज्यादा से ज्यादा चर लेना चाहते हैं अगर यह आरोप सही है तो यह कानपुर देहात का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि रक्षक ही भक्षक के रूप में बदल गया है।बाड़ ही उजाड़ खाने लगी है। चोर ही अकड़ कर न्यायाधीश बन बैठा है भोले भाले किसानों के जिला को लूटने का एक संगठित प्रयास है।अजीब गहमागहमी है , जनपद की राजनीतिक दिशा दिग्भ्रमित है।आश्चर्य जनक सन्नाटा है।नाविक के द्वारा ही नाव डुबोने का प्रयास है बुद्धिजीवी मौन है लगता है यह धृतराष्ट्र का दरबार है,जहां घनघोर अंधेरा और निष्तब्धता है। उम्मीदों का सूर्य अस्ताचल की ओर है। रीढ़ विहीन समाज अपने अस्तित्व की लड़ाई नहीं लड़ सकता।कानपुर देहात कुछ ऐसे नेतृत्व की ओर दृष्टिपात करता है।जिनकी आंखों में मनोहर सपना हो,जनपद के उत्थान का मांड्यूल हो जहां जाति के आपसी द्वंद की जगह सहकारिता हो । अन्नदाता किसान यूरिया की खाद के लिए भटक रहा है और उसके चुने हुए प्रतिनिधि जाति-जाति खेल रहे हो । उचित तो यह होता कि कानपुर देहात के बुद्धिजीवी उस दिन को धिक्कार दिवस के रूप में मनाते।जिस दिन उनके क्षत्रप जातियों का फूहड़ खेल खेल रहे थे । पर कहीं से कोई सदा न आई,समाज में इसका विश्लेषण भी कौन किसके साथ के रूप में किया गया,पर किसी योग्य पत्रकार और कानपुर देहात के बुद्धिजीवियों ने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया,कि ऐसे अनर्गल,अतार्किक,निष्प्रयोज्य , निष्प्राण,अव्यवहारिक और अव्यवस्थित सवालों को क्यों उठाया गया । क्या यह शेर कानपुर देहात के लिए सटीक है ?हाल इस कदर खराब है मयकदे का साकी कि उनको मिल रही है जिन्हें पीना नहीं आता।

संवाददाता आकाश चौधरी कानपुर