नास्तिकों द्वारा एक ही धर्म पर सवाल उठाने पर उठा विमर्श

उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय (दैनिक कर्मभूमि) कानपुर नास्तिक विचारधारा और धार्मिक आस्थाओं के बीच चल रही बहस एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। आचार्य गौरव शास्त्री ने नास्तिकों के दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा कि अक्सर देखा जाता है कि नास्तिक केवल एक ही धर्म को निशाना बनाते हैं। उनका कहना है कि आखिर क्यों नास्तिकों को सिर्फ एक ही धर्म में कमियां नजर आती हैं और उसी धर्म के सुधार की बात बार-बार की जाती है।

निष्पक्षता पर उठे सवाल

आचार्य गौरव शास्त्री ने कहा कि यदि नास्तिकता वास्तव में तर्क और विवेक पर आधारित है, तो फिर सभी धर्मों की मान्यताओं, परंपराओं और व्यवस्थाओं पर समान रूप से प्रश्न उठने चाहिए। किसी एक धर्म को लगातार लक्ष्य बनाना निष्पक्ष आलोचना नहीं, बल्कि वैचारिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है। इससे समाज में भ्रम और टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है।

सामाजिक प्रभाव का तर्क

आचार्य गौरव शास्त्री ने कहा कि नास्तिक प्रायः उसी धर्म पर अधिक सवाल उठाते हैं, जिसका सामाजिक प्रभाव उनके आसपास अधिक होता है। जिस वातावरण में व्यक्ति पला-बढ़ा होता है, उसी धर्म की परंपराओं और ग्रंथों से वह सबसे अधिक परिचित होता है। इसी कारण आलोचना भी उसी तक सीमित रह जाती है, जबकि अन्य धर्मों की कमियां चर्चा में नहीं आ पातीं।

आलोचना और अपमान में अंतर जरूरी

आचार्य गौरव शास्त्री का कहना है कि किसी भी धर्म या विचारधारा में सुधार की गुंजाइश हो सकती है, लेकिन आलोचना मर्यादित और संतुलित होनी चाहिए। जब आलोचना आस्था के अपमान में बदल जाती है, तब वह समाज को जोड़ने के बजाय विभाजन पैदा करती है।

संतुलन की जरूरत

इस पूरे विमर्श ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि नास्तिकता का उद्देश्य क्या केवल सवाल उठाना है या समाज को बेहतर दिशा देना भी। विशेषज्ञों का मानना है कि संतुलित समाज वही है, जहां तर्क और श्रद्धा दोनों को सम्मान मिले और संवाद के माध्यम से सुधार की राह निकले।

संवाददाता आकाश चौधरी कानपुर