मातृभाषा:कारागार की कुंजी
——————–
लेख संपादकीय
राष्ट्रीय (दैनिक कर्म भूमि) अंबेडकर नगर
भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी ने लिखा है-“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति कर मूल।बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटे न हिय के शूल।।”कदाचित अंतस्थल की भावनाओं को सर्वोत्तम तरीके से व्यक्त करने का सर्वोत्कृष्ट माध्यम मातृभाषा है।यही कारण है कि प्रख्यात फ्रांसीसी शिक्षाशास्त्री अल्फोंसे ने तो मातृभाषा को दासता रूपी कारागार से मुक्ति प्रदायिनी कुंजी तक कहा है।
चाणक्यनीति के अनुसार कोई भी पराजित राष्ट्र तबतक स्थायी रूप से दासत्व का शिकार नहीं होता जबतक वहाँ की भाषा और संस्कृति जीवंत होती हैं।यही कारण है कि आक्रांताओं द्वारा भूमि विजय के उपरांत अगला आक्रमण पराजित राष्ट्र की पाठशालाओं और वहाँ की जीवनपद्धति पर किया जाता है।जिसके लिये आक्रांताओं द्वारा अपनी भाषा और अपनी संस्कृति जबरिया थोपी जाती है।इतिहास साक्षी है कि जिन जिन राज्यों ने आक्रांताओं की संस्कृति और भाषा को ही अंगीकृत किया है वे आज भी मानसिक रूप से गुलाम ही हैं।किंतु जिन जिन राज्यों के लोग अपनी मातृभाषा और संस्कृति को येन केन जीवंत रखा वे कालांतर में आज़ाद हो गए।इस प्रकार आज़ादी को शाश्वत बनाये रखने का सशक्त माध्यम मातृभाषा ही है कोई अन्य नहीं।
भारत के परिप्रेक्ष्य में यदि कहा जाए तो आजकल यहाँ अंग्रेजियत का भूत जनमानस के सिर चढ़कर बोल रहा है।कदाचित यह सदियों तक गुलामी का प्रतिफल औरकि रोजी-रोटी से भी जुड़ा प्रश्न है।इतना ही नहीं आधुनिकता कर दौर में भारतीयों द्वारा पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण एक फैशन सा बन गया है।गांवों से लेकर शहरों तक टूटी फूटी अंग्रेज़ी में बात करना और बोलना अपने आपको हाई सोसाइटी के दिखाने का पर्याय बनता जा रहा है,जोकि राष्ट्रीय अस्मिता और स्वतंत्रता की निरंतरता के लिए गम्भीर खतरा बना हुआ है।अतएव भारतीयों को अपनी-अपनी मातृभाषाओं के साथ राजभाषा हिंदी को व्यवहृत करना चाहिए अन्यथा मानसिक गुलामी की भावना एकबार फिर उन्हें ऐसा जकड़ेंगीं जिनसे पार पाना सहज नहीं होगा।
विश्व के अधिकांश देश जैसे चीन,रूस,फ्रांस,दक्षिण अफ्रीका और जापान आदि कभी भी अंग्रेज़ी को महत्त्व नहीं देते हैं।यही कारण है कि उनके नागरिकों में स्वदेशप्रेम और राष्ट्रीय अस्मिता की भावना कूट कूट कर भरी होती है।इतिहास साक्षी है कि 1887में जर्मनी द्वारा फ्रांस के दो जिलों को कब्जा करने के बावजूद वह उन्हें ज्यादा दिनों तक अपने नियंत्रण में नहीं रख सका क्योंकि फ्रांसीसी लोगों ने जबरिया थोपी गयी जर्मन भाषा को कभी खुलेमन से स्वीकार नहीं किया औरकि सदैव गुप्त रूप से फ्रेंच का अध्ययन और दैनिक जीवन मे प्रयोग जारी रखा।यही कारण है कि फ्रांसीसी विद्वान अल्फोंसे ने मातृभाषा को कैदखाने रूपी गुलामी के विरुद्ध मुक्ति प्रदायिनी कुंजी कहकर सम्बोधित किया है।
मातृभाषा हृदय की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम होने के साथ-साथ संस्कारों का भी संवर्धन खरती है।किसी भी राष्ट्र के महापुरुषों के जीवनदर्शन,शौर्य गाथाएं आदि वहाँ की मातृभाषा में होती हैं,न कि अन्य भाषा में।यही कारण है कि जो लोग अपनी मातृभाषा का अध्ययन और अनुप्रयोग नहीं करते वे मन के भावों को न तो स्प्ष्ट रूप से व्यक्त कर पाते हैं और न समझ ही सकते हैं।अपने आदर्शों और मूल्यों को भूलने के कारण आचरण की प्रतिकूलता भी परिलक्षित होती है।जिससे आये दिन टकराव उत्तपन्न होता रहता है।कदाचित भारतीय शिक्षा प्रणाली में अंग्रेज़ी विद्यालयों की बढ़ती अवधारणा भारतीयों को भारतीय संस्कृति से दूर करने का ही प्रयास है,जिसे रोका जाना चाहिए।शिक्षा जे प्रत्येक स्तर पर मातृभाषा या फिर राजभाषा का अध्ययन-अध्यापन अनिवार्य होना चाहिए अन्यथा देश में राष्ट्रभाव की कमी आयेदिन बढ़ती ही जाएगी।
-उदयराज मिश्र
नेशनल अवार्डी शिक्षक
9453433900
रिपोर्ट-विमलेश विश्वकर्मा ब्यूरो चीफ अंबेडकरनगर
You must be logged in to post a comment.