उत्तर प्रदेश( राष्ट्रीय दैनिक कर्मभूमि )जौनपुर
जौनपुर।जौनपुर के साहित्यिक गौरव प्रचार- प्रसार से दूर, निरन्तर लेखनी में रत, ददरा, मड़ियाहूं, जौनपुर निवासी डॉ.सत्य नारायण दुबे शरतेन्दु जी जो पांच दशकों से लेखनी के माध्यम से आदर्श शिक्षक होने के साथ साथ जिनकी बी.एड.,एम.एड., बी.टी.सी., इतिहास, गृहविज्ञान, हिंदी के बी.ए. एम.ए. पाठ्यक्रम के समस्त प्रश्नपत्रों सहित साहित्य, उपन्यास, कहानी, कविता आदि के 300 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । 80 वर्ष सेअधिक उम्र के आखिरी पड़ाव पर इन्होंने श्रीमद्भागवत गीता का पद्यानुवाद अनुवाद किया और वर्तमान में श्री बाल्मीकि रामायण का पद्यानुवाद कर रहे हैं जिसमें उन्होंने बालकांड का पद्यानुवाद कर लिया है और अयोध्या कांड का कर रहे हैं ।
बालकांड के पद्यानुवाद के कुछ प्रमुख पद्य हैं-
मात्र मेरी पीड़ा से ही मुने-
श्लोक यह मुंह से सुनि: सृत है हुआ
मुनि श्रेष्ठ अब वर्णन करो श्री राम का-
जो श्रेष्ठ तम आदर्श होगा राम का !!
मुनि श्रेष्ठ नारद् से सुना जिस भांति है-
वर्णन करो पावन चरित श्री राम का।
जैसा प्रकट और गुप्त प्राप्त वृतांत है-
लक्ष्मण, सीता सहित श्री राम का ।।
ज्ञात होता रहेगा सब कुछ तुम्हें-
इस ग्रंथ में वर्णित तुम्हारी भावना ।
झूठी नहीं होगी कभी मुनिश्रेष्ठ है-
श्री राम के पावन चरित् की कामना ।।
डॉ. शरतेन्दु जी ने बताया कि महर्षि बाल्मीकि आदि कवि हैं वह संसार के सभी कवियों के गुरुदेव हैं । उनका आदि काव्य “रामायण” भूतल का प्रथम महाकाव्य है वह सभी के लिए पूजनीय है। यह ग्रंथ भारत का गौरव है। समस्त ग्रंथों का स्रोत ग्रंथ है । यह भारत की राष्ट्रीय धरोहर है। इसी कारण इसका पठन, मनन ,संग्रह, श्रवण सबको करना चाहिए। यह ग्रंथ संस्कृत भाषा में रचित है। संसार की लगभग सभी भाषाओं में इसके अनुवाद भी उपलब्ध हैं ।श्री बाल्मीकि रामायण कथा पाप का विनाश करने वाला है सभी काव्यों का बीज है
डॉ शरतेन्दु जी ने बताया कि भगवान श्रीराम की प्रेरणा से उन्होंने बाल्मीकि रामायण को पद्य में लिखने का बीड़ा उठाया ।उन्होंने भगवान श्री राम से प्रार्थना की प्रभु आप ही मेरी मनोकामना पूरी करने में सक्षम हैं ,भगवान ने मेरी सुन ली, फिर क्या था लेखनी हाथ में लिए सामने था बाल्मीकि रामायण के बालकांड का खुला प्रथम सर्ग का प्रथम श्लोक दो तीन बार पढ़ा फिर क्या था भावों की बयार बही, शब्दों के फूल बरसने लगे, मैं उन्हें बीन बीन कर पद की माला में गूँथने लगा । यही क्रम चार-पांच महीने चला मैं जब लिखने बैठता रो पड़ता, ऐसे लगता जैसे कोई बोल रहा है और मैं हिंदी पदों में उसे लिख रहा हूं वह भी कोई कटिंग नहीं ,कोई संशोधन नहीं, श्लोक पर श्लोक, सर्ग पर सर्ग इसी तरह लिखता रहा। 5 महीने में बालकाण्ड के 77 सर्ग पूर्ण हो गए ।अगले दिन से अयोध्या कांड आरम्भ कर दिया ।
जौनपुर के साहित्यिक गौरव डॉ शरतेन्दु जी को विभिन्न पुरस्कार भी मिल चुके हैं परंतु पुरस्कारोंऔर प्रचार प्रसार से दूर निरंतर लिखने में अपने को व्यस्त रखते हैं। 1999 में गांधी स्मारक पी.जी.कॉलेज समोधपुर जौनपुर से बी.एड. विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात आज भी लेखन कार्य को नहीं छोड़े हैं । इन्हें निम्न प्रमुख पुरस्कार प्राप्त हुए हैं –
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने “” भारत भूमि महान” काव्यकृति का राष्ट्रपति भवन में विमोचन कर डॉ. शरतेन्दु को सम्मानित किया ।
तालकटोरा स्टेडियम नई दिल्ली में भारतीय दलित साहित्य अकादमी में देश के महान नेताओं की उपस्थिति में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार व दूसरी बार विशिष्ट सेवा पुरस्कार से अलंकृत हुए।
जय स्वतंत्र भारत काव्य ग्रंथ का राज्यपाल अरुणांचल प्रदेश ने विमोचन के साथ रचनाकार को सम्मानित किया।
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने डॉ. शरतेन्दु की कृति लोक साहित्य की रूप रेखा पर रामनरेश त्रिपाठी नामित पुरस्कार प्रदान किया।
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ में लेखक की कृति भोजपुरी लोक साहित्य को पुरस्कृत किया गया।
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के रोवर्स-रेंजर्स जनपद जौनपुर संयोजक एवं टी.डी. पी.जी.कॉलेज, के बी.एड. विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अजय कुमार दुबे जी का कहना है कि डॉ. शरतेन्दु जी की सरलता, सहजता, विषय ज्ञान तथा 80 वर्ष के आयु के बावजूद आठ- आठ घंटे लेखनी में रत रहना विद्यार्थियों, शोधार्थियों का निःस्वार्थ भाव से मार्गदर्शन करते रहना समस्त शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए आज भी प्रेरणा स्रोत और जनपद जौनपुर के गौरव हैं । डॉ.शरतेन्दु जी द्वारा रचित श्री बाल्मीकि रामायण का पद्यानुवाद निःसंदेह हिंदी साहित्य की अमरकृति है।
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