राष्ट्रीय दैनिक (कर्मभूमि) अंबेडकर नगर
ज्ञान-विज्ञान और दर्शन के लिए पूरे विश्व में जगद्गुरु की पदवी से विभूषित भारत की उर्वर भूमि प्रत्येक देशकाल और परिस्थिति में नायाब रही है औरकि महान प्राणभूत विभूतियों की जन्मदात्री बनती रही है।बीसवीं सदी में डॉ राजेन्द्र प्रसाद उन्हीं महान विभूतियों में एक औरकि हर देशकाल परिस्थिति में प्रासङ्गिक हैं।जिनकी तुलना वैश्विक स्तर पर किसी अन्य विभूति से कदापि नहीं की जा सकती।
डॉ राजेन्द्र प्रसाद एक समाजसुधारक,एक चिंतक,एक विचारक होने के साथ-साथ प्रशिक्षण से वकील और कृत्तित्व से राष्ट्रपुत्र तथा व्यक्तित्व से महानता के सागर थे।उनके व्यक्तित्व का हर कोना किसी न किसी रूप में नई दिशा और नई सोच का परिचायक है।भारतीय शिक्षा जगत में उनकी स्नातक की परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिका मूल्यांकित करते हुए किसी परीक्षक की यह टिप्पणी कि-Examinee is better than examiner(परीक्षार्थी परीक्षक से बहुत अच्छा है) मील की पत्थर है।जो यह प्रदर्शित करती है कि डॉ राजेन्द्र प्रसाद कितने कुशाग्र बुद्धि के अध्येता थे।विश्व इतिहास में आजतक ऐसा कोई दृष्टांत नहीं मिलता जिसमें कोई छात्र परीक्षा में पूर्णांक से भी ज्यादा अंक प्राप्त किया हो।स्नातक की परीक्षा में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को 50 अंक के प्रश्नपत्र में परीक्षक ने स्वयम से अच्छा मॉनते हुए एक अंक अधिक अर्थात 51 अंक प्रदान किये थे।इतना ही नहीं उस समय प्रश्नपत्र में कुल दिए गए 10 प्रश्नों में से कोई 5 हल करने होते थे किंतु डॉ राजेन्द्र प्रसाद सभी 10 प्रश्न हल करके लिख देते थे कि कोई 5 प्रश्न जांच लीजिए।इसप्रकार सम्पूर्ण पाठ्यक्रम का सौ फीसदी ज्ञान जिस छात्र को आजतक हुआ,निःसन्देह वह केवल और डॉ राजेन्द्र प्रसाद ही थे।
प्रश्न जहाँतक भारतीय राजनीति में डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के योगदान का है तो भारतीय राजनीति इस महान ज्ञानपुंज को पा स्वयम ही धन्य होती है।डॉ राजेन्द्र प्रसाद 1931 के नमक आंदोलन और 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के महानायक तथा बिहार व महाराष्ट्र के जननेता भनकर स्वयम को स्थापित किये थे।जिसके कारण उन्हें जेलयात्राएँ भी करनी पड़ीं।1946 के संवैधानिक चुनावों में जीतकर जहां वे केंद्र सरकार में खाद्य एवम कृषि मंत्री नियुक्त हुए वहीं 15 अगस्त 1947 को देश को आज़ादी मिलने के पश्चात संविधान सभा के अध्यक्ष बने।इनकी ही अगुवाई में भारतीय संविधान बनकर तैयार औरकि 1950 में लागू हुआ।
गौरतलब है कि भारत के इस महान विभूति का जन्म 3 दिसंबर 1884 को आज ही के दिन आज के बिहार प्रान्त के जीरादेई ग्राम में सिवान जिले में हुआ था।इनकी मुख्य शिक्षा दीक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय तथा प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुई थी,जहाँ इन्होंने आल राउंड प्रथम श्रेणी में ससम्मान सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
डॉ राजेन्द्र प्रसाद की राजनैतिक दृढ़ इच्छा शक्ति भी बहुत प्रबल थी।यही कारण है कि 1950 में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल के निधन के उपरांत प्रधानमंत्री नेहरू के न चाहने पर भी डॉ राजेन्द्र प्रसाद उनकी अंतिम यात्रा में न केवल सम्मिलित हुए अपितु सरदार पटेल की इच्छाओं का समादर करते हुए सोमनाथ मंदिर के अवशेष कार्य को पूर्ण कराया।राष्ट्रपति के रूप में 1950 से 1962 तक के कुल 12 वर्षों में खाद्यान्न संकट से जूझ रहे भारत को उबारते हुए चीन से लोहा लेना उनके दृढ़ व्यक्तित्व का परिचायक है।28 फरवरी 1963 को अपने निधन से पूर्व तक डॉ राजेन्द्र प्रसाद भारत को सामरिक व आर्थिक दृष्टिकोण से महाशक्ति बनाने के उपायों पर सदैव मन्थन करते रहते थे।अनेक मुद्दों पर प्रधानमंत्री नेहरू से मतभेद के बावजूद यह महान विभूति आज भी भारतीय राजनीति के साथ साथ शिक्षाजगत के लिए उदीयमान सूर्य की तरह प्रकाशित कर रहे हैं।जिनका कोई सानी और उपमेय नहीं है।
-उदयराज मिश्र
नेशनल अवार्डी शिक्षक
945343300
रिपोर्ट-विमलेश विश्वकर्मा ब्यूरो चीफ अम्बेडकर नगर
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