चित्रकूट: प्रभारी जनपद न्यायाधीश की अध्यक्षता में हिंदी दिवस के अवसर पर बुधवार को विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें प्रभारी जिला जज रवींद्र श्रीवास्तव ने लोगों को जन सामान्य की भाषा हिंदी में काम करने, लिखने-पढ़ने और संकल्प लेने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि संसार में हंसी का पात्र बनने के बजाय हम यह संकल्प लें कि अपनी राष्ट्रभाषा में काम करेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि अन्य भाषाओं के तिरस्कार की भी आवश्यकता नहीं है। प्रभारी जनपद न्यायाधीश ने कहा कि चित्रकूट हिंदीभाषी क्षेत्र है। यहां गोस्वामी तुलसीदास ने लगभग छह सौ साल पहले ही श्रीरामचरित मानस जैसा महाकाव्य दे चुके हैं। उन्होंने बताया कि यद्यपि हिंदी के क्षेत्र में विविधता की पराकाष्ठा थी पर विधिक अड़चन एवं अव्यवहारिक सोच की वजह से यह कार्यालयों की भाषा नहीं हो पाई थी। प्रदेश में एसए मैकडोनल ने 18 अप्रैल 1900 में हिंदी भाषा के प्रयोग की अनुमति दी। इसके बाद 14 सितंबर 1949 में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देवनागरी लिपि को अंगीकार किया गया। उच्च न्यायालय ने सितंबर 1969 में शासनादेश से हिंदी भाषा को प्रयोग करने की अनुमति प्रदान की। बताया कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश स्व. कुंवर बहादुर अस्थाना ने अक्टूबर 1975 में हिंदी में ऐतिहासिक निर्णय वीरेंद्र कुमार चैधरी बनाम जिला मजिस्ट्रेट इलाहाबाद घोषित किया। तब से लेकर अब तक हिंदी में प्रगति के साथ काम हो रहा है। भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हिंदी सशक्त भाषा के रूप में अपना स्थान कायम कर चुकी है। पश्चिमी देश भी अपनी पुस्तकों, चलचित्रों व लेखों को हिंदी में अनुवादित कर प्रकाशित करा रहे हैं क्योंकि हिंदी में ही अधिक ग्राह्यता है। इस मौके पर अन्य वक्ताओं ने भी हिंदी पर अपने अपने विचार रखे। सभा का संचालन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की पूर्णकालिक सचिव विदुषी मेहा ने किया। इस मौके पर न्यायिक अधिकारी मौजूद रहे। सभी ने हिंदी को जनजन की भाषा बनाने पर जोर दिया।
*ब्यूरो रिपोर्ट* अश्विनी कुमार श्रीवास्तव
*जनपद* चित्रकूट
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