उत्तर प्रदेश(दैनिक कर्मभूमि) चित्रकूट-भगवान राम की साधना स्थली चित्रकूट में राष्ट्रीय रामायण मेला के पंच दिवसीय आयोजन में चतुर्थ दिवस डा0 तीरथदीन पटेल ने बताया कि माता कैकेयी ने विधवा होने पर भी राष्ट्र को एकसूत्र में बांधा है। बताया कि राम का वनवास काल राष्ट्र का सुधारक काल कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने माता कैकेयी को राष्ट्र की नायिका बताया। राम के वनवास काल में राक्षसों का विनाश होने के साथ ही योगी तपस्वी, ऋषि मुनियों के संकट दूर हुए थे। तभी विश्व में रामराज्य आया था। रामराज्य लाने की प्रथम श्रेष्ठता माता कैकेयी ही हैं। चित्रकूट की महिमा का बखान करते हुए डा0 पटेल ने कहा कि यहां का एक-एक कण राममय, यहां की रज भगवान का प्रसाद रुप और धूल माथे का तिलक है। कामदगिरि की परिक्रमा के बारे में बोला कि परिक्रमा स्थल की धूल सुहागिन स्त्रियों का सिंदूर और पुरुषों के माथे का शीतल चंदन है। प्रयागराज से पधारे डा0 सीताराम सिंह ‘विश्वबंधु’ ने रामचरितमानस को जीवन जीने का संविधान बताया। वहीं इसे मर्यादा ग्रंथ भी बताया। कोमल द्विवेदी कवियित्री ने कविता के माध्यम से चित्रकूट की महिमा का वर्णन किया। म0प्र0 सतना के कथा व्यास रामविश्वास तिवारी ने ‘अनुचित उचित विचार तजि, जे पालहिं पितु बैन’ का संदर्भ देते हुए माता, पिता और गुरु की सेवा को सबसे बड़ा धर्म बताया। रामकथा व्यास रामभरोसे तिवारी ने आनंद की व्याख्या करते हुए ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम को ही आनंद बताया। जम्मू-कश्मीर से पधारे सनातन संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान तथा वर्ल्ड ऑर्गेनाइजेशन के कार्यकता डा0 मसूद इकबाल ने सारी मानवता को प्रेम, भाईचारे और एकता का संदेश दिया। कहा पेड़, पत्ते और डालें तक परेशान हो जायेंगी जिस दिन परिंदे हिन्दू और मुसलमान हो जायेंगे। उन्होंने बताया कि वेद और कुरान के आधार पर एकता के विषय में बताया कि संपूर्ण मानवता एक पिता की संतान है। एक खुदा के सब बंदे हैं एक आदम की सब संतान। तेरा मेरा खून का रिश्ता मैं भी सोचूं तू भी सोच प्यार का शबनम हर आयत में प्रेम का अमृत हर श्लोक फिर क्यों इंसान खून का प्यासा। उन्होंने ऋगवेद की चर्चा करते हुए कहा कि ‘महो दिवः प्रथिव्याश्च सम्राट्’ अर्थात् ईश्वर विशाल आकाश और पृथ्वी का सर्वोच्च शासक है। और ‘भूतस्य जातः पतिः एक आसीत्’ अर्थात् ईश्वर पैदा किए गए सारे संसार का एक और अकेला स्वामी है। उन्होंने बताया कि ‘ईक्म् ब्रम्हा द्वितीय नास्तेः नहे ना नास्ते किंचन’ अर्थात् ईश्वर एक ही है दूसरा नहीं है। सुल्तानपुर से पधारे डा0 कृष्णमणि चतुर्वेदी ‘मैत्रेय’ ने बड़भागी शब्द की विवेचना करते हुए मानव से इतर प्रथम श्रेणी में कागभुशुंडी जी को अत्यन्त बड़भागी बताया। ‘जग कोउ नहिं तुम सम बड़भागी।’ सीता हरण दो विभूतियों ने अपनी आंखों से देखा था जिनमें सुग्रीव एवं जटायु हैं। शक्ति सम्पन्न होते हुए भी सुग्रीव नारी की मदद के लिए आगे नहीं बढ़े जबकि जटायु जी चुनौती देते हुए बढ़े ‘सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहौं जातु धान कर नासा।।’ इसके बाद उन्होंने अहिल्या को बड़भागी कहते हुए यह सिद्ध किया कि जो श्रीराम के चरण को स्पर्श कर लेता है वही बड़भागी की श्रेणी में आता है। ‘हम सब सेवक अति बड़भागी, संतत राम चरन अनुरागी’। डा0 मैत्रेय ने ‘भूप सहस दस एकहिं बारा’ का तार्किक विवेचन करते हुए यह बताया कि दस हजार राजा एक साथ धनुष नहीं उठा रहे थे बल्कि एक ‘वर’ को छोड़कर शेष राजा थे इस संदर्भ में इस चौपाई का वर्णन हुआ है जैसे- ‘वानर मनुज जाति दुइ बारे’।म0प्र0 के खण्डवा से पधारे रमेश चन्द्र तिवारी ने अरण्यकाण्ड का प्रसंग वर्णित करते हुए नारी महत्ता की मीमांसा प्रस्तुत की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जहां नारी की पूजा होती है वहां लक्ष्मी का वास होता है। बंबई से पधारे पं0 वीरेन्द्र प्रसाद शास्त्री रामायणी ने राम नाम की महिमा का सप्रमाण बखान करते हुए बताया कि ‘यद्यपि प्रभु के नाम अनेका। एक ते अधिक एक ते एका।।1।। राम सकल नामं ते अधिका। होहु नाथ अघ खग गन बधिका।।2।।’ अर्थात् श्रीराम के नाम से बढ़कर दूसरा कोई नाम नहीं है। सनत कुमार मिश्र मानस किंकर ने हनुमंत लाल को एकादशवें रुद्र का अवतार बताया। लंका जलाने के समय ‘रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूंछ कीन्ह कपि खेला।’ कह कर जताया कि बुराई पर निश्चित रुप से अच्छाई की विजय होती है। बताया कि हनुमान जी श्रीराम के अनन्य उपासक है। ‘सो अनन्य गति जाके मति न टरै हनुमंत, मैं सेवक सचराचर रुप स्वामी भगवंत’। ग्वालियर के डा0 श्रीलाल पचौरी ने बताया कि कैकेयी उच्च धर्मपरायण कुल की कन्या तथा धर्मधुरंधर राजा दशरथ की पत्नी थीं। उनका एक दासी मंथरा के बहकावे में आना असंभव सा लगता है। ‘विश्व विदित इक कैकइ देसू। सत्यकेतु तहं बसइ नरेसू।’ उनका नैहर का कुल प्रताप भानु के भावुक व शीघ्र निर्णय से पराभूत हो गया था। उन्होंने बताया कि सम-साम्यक के प्रति समर्पित हो सकता है किंतु साम्यक-सम के प्रति नहीं। मुख को चंद्रमा के समान तो कहा जाता है किंतु चंद्रमा को मुख के समान नहीं कहा जा सकता। कैकेयी के विरोध में संकुचित पुत्रमोह को मान लेना अज्ञान माना जायेगा।
*ब्यूरो रिपोर्ट* अश्विनी कुमार श्रीवास्तव चित्रकूट
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