उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय (दैनिक कर्मभूमि) चित्रकूट सरकारी दफ्तरों की दुनिया में जहां चापलूसी और चुप्पी अक्सर तरक्की का रास्ता बन जाती है, वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने उसूलों से समझौता नहीं करते। चित्रकूट में ऐसा ही एक नाम इन दिनों सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है—मनीष निगम। कभी कलेक्ट्रेट के भरोसेमंद और ईमानदार स्टेनो के रूप में पहचाने जाने वाले मनीष अब आरोपों और अफवाहों की आँधी में घिरे हैं, हालांकि सभी आरोपों की जांच पहले ही हो चुकी है और मनीष को क्लीन चिट दी जा चुकी है मगर फिर भी वहीं आरोप बार-बार क्यों लगाए जा रहे हैं, आखिर मनीष को सदर तहसील से हटाने से किसको फायदा पहुंचने वाला है, इसके पीछे कौन है ये एक बड़ा सवाल बना हुआ है। मनीष की ईमानदारी, सच्चाई किसकी आंखों की किरकिरी बन गई है। जांच में दोषमुक्त, फिर भी सजा क्यों?”—मनीष का सवाल
जनवरी 2025 में एडीएम (न्यायिक) की जांच में मनीष को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया गया। इसके बावजूद, हर कुछ दिनों में किसी नए नाम से शिकायत दर्ज हो रही है। मनीष का दावा है कि यह सब सोची-समझी साजिश के तहत किया जा रहा है, ताकि उनकी छवि को धूमिल किया जा सके और उन्हें जिला मुख्यालय से हटाया जा सके। उनका कहना है कि शिकायतें उन्हीं के विभाग के कुछ लोगों द्वारा करवाई जा रही हैं, जिनकी नजर डीएम कार्यालय में खाली पड़ी स्टेनो की कुर्सी पर है।
खुलासा: कुर्सी की लड़ाई या उसूलों की सजा ।
मनीष इस समय डीएम कार्यालय में नहीं, बल्कि सीएम आईजीआरएस पोर्टल पर कार्यरत हैं। बावजूद इसके, उन्हें बार-बार स्टेनो पद को लेकर निशाना बनाया जा रहा है। सवाल उठता है कि यदि कोई कर्मचारी विभागीय जांच में निर्दोष पाया गया हो, तो क्या उसे फिर भी लगातार मानसिक उत्पीड़न झेलना चाहिए। क्या यह प्रशासनिक पारदर्शिता का उदाहरण है, या फिर एक ईमानदार कर्मचारी के खिलाफ सत्ता और साजिश का गठजोड़?
*”मैंने कोई गलत काम नहीं किया”—मनीष की खामोश चीख* मनीष निगम कहते हैं,
“मैंने राजापुर, मानिकपुर, कलेक्ट्रेट और न्यायिक शाखा में सेवा दी है। विभाग द्वारा आवंटित ब्लॉक परिसर में रहता हूं। हर साल अपनी संपत्ति का विवरण समय पर देता हूं। अगर मैं दोषी होता, तो एडीएम मुझे क्लीनचिट क्यों देते?”
उनका यह भी कहना है कि उनके खिलाफ बार-बार शिकायतें करके उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश की जा रही है, लेकिन वे न तो झुकेंगे और न ही अपने उसूलों से समझौता करेंगे।
*ईमानदारी की कीमत या राजनीतिक साजिश?*
मनीष निगम की कहानी सिर्फ एक कर्मचारी की नहीं है। यह उन तमाम सरकारी कर्मियों की दास्तां है जो सिस्टम के भीतर रहकर भी सिस्टम की सच्चाई से लड़ने का हौसला रखते हैं। अगर ऐसे कर्मचारियों को बदनाम करने की प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो वो दिन दूर नहीं जब हर सच्चा कर्मचारी खुद को मनीष समझकर खामोश रह जाएगा।
रिपोर्टर ठाकुर पंकजसिंह राणा चित्रकूट
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