उत्तर प्रदेश ( दैनिक कर्मभूमि) जौनपुर
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महाराष्ट्र के पालघर में संतो के तिहरा हत्याकांड ने पूरे संत समाज को हिला के रख दिया । वैसे देखा जाए तो ये मॉब लिंचिग थी ,जिसमे एक समुदाय विशेष के कुछ अराजक तत्वों ने बेवजह तीन संतो की पीट पीट कर हत्या कर दी । जिस गांव में यह निंदनीय घटना हुआ है,उसका नाम तक ज्यादातर लोग नहीं जानते, बावजूद इसके इस हत्याकांड का वीडियो करोड़ों दिलों को दहला रहा है, रुला रहा है तो समझा जा सकता है कि ये कितना वीभत्स है। वीडियो साफ बयां कर रहा है कि पुलिस न सिर्फ मौजूद है बल्कि इस हत्याकांड में या तो भागीदार या हत्यारों के आगे समर्पण करती दिख रही है। मै पुलिस को भारत में सबसे ज्यादा नकारात्मक होना मानता हूं । भारतीय पुलिस को केवल चंद रुपए की रिश्वत , काला चस्मा वर्दी और मूंछ से प्यार है बाकी आम जनता को परेशान करना और रौब जमाना तो भारतीय पुलिसिया का जन्मसिद्ध अधिकार हो जैसे । खैर 17 की घटना है, 19 तक 110 गिरफ्तारियां और उच्चस्तरीय जांच के आदेश भले ही उद्धव सरकार का एक्शन बयां कर रहे हो, लेकिन जिस राज्य में पुलिस की आंखों के सामने 2 बुजुर्ग साधुओं और ड्राइवर की पीट-पीट कर इस तरह हत्या कर दी गई हो, वहां कानूनराज की स्थिति क्या है, इस पर सरकार पर्दा नहीं डाल सकती।
हत्यारे आखिर हैं कौन? बाहर से तो आए नहीं होंगे, हैं तो स्थानीय गांव के ही, तो फिर इस गांव की जातीय संरचना क्या है? कैसे लोग रहते हैं यहां? ये वो सवाल हैं, जिनके जवाब मैं विमर्श से गायब देख रहा हूं। मैंने आदत के मुताबिक उस गांव का ही लेखा-जोखा खंगालने की कोशिश की, इतने बड़े देश में एक गांव की जानकारी निकाल पाना और वो भी आधिकारिक, आसान तो नहीं होता, लेकिन कोशिश ज़रूर करनी चाहिए, तो मैंने की है। जनगणना 2011 के आंकड़े हैं, औसत जनसंख्या वृद्धि दर लागू करने पर भी जो आंकड़ा दिख रहा है, वो बताता है कि गांव का हर तीसरा पुरुष सदस्य तीन बेगुनाहों को मारने या हत्या का चश्मदीद बनने के लिए सड़क पर उतर आया था। ये जो गांव है, वहां की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत साक्षरता दर से काफी नीचे है। ये बताता है कि अनपढ़ों के गांवों की भी आबोहवा कितनी बदल चुकी है।
पालघर के जिला कलेक्टर कैलाश शिंदे ने बताया, “प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, सुशील गिरि महाराज, जो कांदिवली में एक आश्रम में रहते हैं, दो अन्य लोगों जयेश और नरेश येलगडे के साथ एक वैन में यात्रा कर रहे थे, जिसे उन्होंने सूरत में एक अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए किराए पर लिया था। इनमें से एक शख्स गाड़ी चला रहा था।” बतौर जिलाधिकारी, लॉकडाउन के बावजूद इनलोगों ने मुंबई के कांदिबली से करीब 120 किलोमीटर की दूरी तय कर ली थी। महाराष्ट्र और केंद्रशासित प्रदेश दादरा और नागर हवेली की सीमा पर गढ़चिंचल गांव के पास उनकी गाड़ी को वन विभाग के संतरी ने रोकी, जहां ये घटना घटी। दरअसल, पालघर जिले में जिस जगह मॉब लिंचिंग की ये वारदात हुई है, वहां लॉकडाउन के बाद से लोग दिन-रात लगातार खुद पहरेदारी कर रहे हैं । इलाके में चोर, डाकुओं के घूमने की अफवाह थी । बीते गुरुवार को भी मॉब लिचिंग के घटनास्थल से 30 किलोमीटर दूर एक गांव में ग्रामीणों ने शक के आधार पर कुछ लोगों पर हमला किया था, जिन्हें पुलिस ने बचा लिया था ।.पुलिस सूत्रों के मुताबिक, पथराव के दौरान ही ड्राइवर ने किसी तरह पुलिस को मामले की जानकारी दे दी थी, लेकिन हिंसक भीड़ के आगे पुलिस भी बेबस नजर आई । कासा थाने के पुलिसवालों के अलावा इस हमले में जिले के एक वरिष्ठ अधिकारी समेत पांच पुलिसवाले भी जख्मी हुए हैं ।पुलिस सूत्रों के मुताबिक, कासा थाने के इस इलाके में इस तरह की ये पहली वारदात नहीं है । मॉब लिंचिंग की तीन दिन पहले एक डॉक्टर और तीन पुलिसवालों के साथ थाने के असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर आनंद काले पर ग्रामीणों ने चोर-डाकू समझ कर हमला बोल दिया था ।अगर कोई हमारी मित्रसूची में महाराष्ट्र और खासकर घटनास्थल के आसपास के इलाके या यहां की जानकारी रखने वाला हो तो घटना की सही जानकारी दें। बाकी मित्रों से आग्रह है कि वो लॉजिकल विमर्श से इस आंकड़े का विश्लेषण कर मार्गदर्शन करें।
हजारों साल से शाषित जनता का प्रतिनिधित्व करने वाला बुद्धिजीवी वर्ग शासक के हितों एवं विचारों के संरक्षण का माध्यम होते रहे हैं। शासको ने अपने गुलामो की संस्कृति, भाषा, एवम रहन सहन को दोयम दर्जे एवम निकृष्ट साबित करने के एवज में उनको सत्ता द्वारा सम्मानित तथा बड़े बड़े पद दिए जाते रहे हैं। इस वर्ग को शासकों द्वारा आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। काल बदलता रहा शासक बदलते रहे। कभी मुसलमान शासक तो कभी अंग्रेज हुए। सबने अपने हितों के रक्षक के तौर पर इनका प्रयोग किया। 1947 में अंग्रेजों ने सत्ता अपने बुद्धिजीवियों को सौंप दिया जिन्होंने अपने आदतानुसार कुछ दशकों तक सत्ता चलाई तथा अंग्रेजों के सत्ता विचार एव नीतियों को प्रचारित एवं संरक्षण करते रहे। इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों ने आत्मचेतना जगाने का कार्य किया फलस्वरूप राष्ट्रवादी सरकारों का गठन शुरू हुआ तथा राष्ट्रीय हितों एव राष्ट्रीय भाषा तथा संस्कृति का प्रोत्साहन शुरू हुआ फलस्वरूप हजारो साल से पोषित, पुष्पित तथा पल्लवित वर्ग अपने को पराजित एवम आजीविका विहीन होने लगा जो उसको मंजूर नहीं था। उसने अनर्गल प्रलाप शुरू किया । उनके विचारों को महत्व भी प्रचार माध्यमों में मिलता रहा क्योंकि उनके नामके आगे अनेक महापुरुष वाची पुरस्कार जुड़े होते रहे। हिंदी या अन्य भाषाओं के समाचार पत्रों के समाचारों पर राष्ट्रीय विमर्श नहीँ होता जिनका प्रसारण 95% भारत मे है परन्तु 5 % भी जिन अंग्रेजी समाचार पत्रों का नहीं था वो सत्य माने जाते रहे। आज समय बदल रहा है। भारतीय जनता ने सत्य को समझ लिया है। वह आत्मसम्मान चाहता है अपनी संस्कृति को जीना चाहता है। जिसकी परिणति के रूप में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने जन्म लिया। भोगी एवम लम्पट वर्ग त्यागियों से पराजित हो रहा है। कुछ और समय धैर्य की जरूरत है इनका बचा खुचा भ्रम भी समाप्त हो जाएगा। जय माँ भारती।
______ पंकज कुमार मिश्रा 8808113709
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