उत्तर प्रदेश ( दैनिक कर्मभूमि)जौनपुर
सरकार ज्यादा से ज्यादा ट्रेनें चला कर घर क्यों नहीं ले आती प्रवासी मजदूरों को
जौनपुर।वर्तमान कोरोना संकट काल में एक बहुत बड़ी समस्या प्रवासी मजदूरों को घर ले आने की है। जहां एक तरफ बहुत से लोग यह मानते हैं कि प्रवासी मजदूरों को जहां है वही रहें। उन्हें स्पष्ट रूप से यह जान लेना चाहिए की सरकारों द्वारा किए गए प्रबंध अभी तक उन प्रवासी मजदूरों का विश्वास जीत नहीं पाए हैं इसी वजह से कि प्रवासी मजदूर अपने घर जाना चाहते हैं। मैं भी इस बात का पक्षधर हूं कि इतने दिन के लाकँ डाउन के बाद अभी उनके मन में अनिश्चितता की स्थिति बनी है और यह बना रहना स्वाभाविक सी बात और ऐसे अनिश्चितता के दौर में उन्हें अपने पैतृक गांव की ओर आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह दृष्टिकोण हम लोगों के लिए हितकर भी है और कोरोना संकट से लड़ने के लिए सहायक भी। उदाहरण के तौर पर मेट्रोपॉलिटन सिटीज में नौकरी के लिए गए मजदूरों के रहने की व्यवस्था देखी जाए तो मुंबई जैसे शहर में एक कमरे में 10 – 10, 12 – 12 मजदूर रहते हैं और जब वह काम करते थे तो वह शिफ्टवाइज उन कमरों में रहते थे। कोई मॉर्निंग शिफ्ट में रहता था तो कोई इवनिंग शिफ्ट में। लेकिन इस लाकँ डाउन के दौरान 10 – 12 मजदूरों को एक साथ रहना पड़ रहा है। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ रही है वही इन्हें संक्रमण होने की संभावना भी प्रबल है और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मुम्बई का धारावी है। अगर ये प्रवासी मजदूर अपने गांव चले जाते हैं तो गांव में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन आसानी से हो जाएगा। दूसरी चीज गांव पहुंच जाने के बाद इन प्रवासी मजदूरों के पास अपने गांव का राशन कार्ड भी होगा जिससे वे आसानी से भोजन की भी समस्या का समाधान हो जाएगा। यदि वे कार्ड के दायरे में नहीं आते तो उनके पास खेती बारी होगी जिससे अपना वर्तमान संकट काल में पेट भर लेगे। मैं आपको यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूं वर्तमान संकट काल में लाकँ टाउन के दौरान सारे काम धंधे बंद होने की वजह से इस संकटकाल में पेट भरना भी एक बड़ी समस्या है। और मुझे यह कहने में बिल्कुल गुरेज नहीं है कि वर्तमान परिस्थितियों में किसी भी राज्य सरकार के पास इन भूखे मजदूरों को दोनों समय भोजन की व्यवस्था का समुचित उपाय नहीं है और ना ही वे सभी मजदूरों को दोनों वक्त की रोटी दे पा रहे है। यह भी एक बड़ा कारण पलायन का है। वैसे जहां तक अपने समाजिक जीवन में मैंने गांवों व शहरों को समझा है यह बात दावे के साथ कह सकता हूं गांव में आज भी कोई भूखा नहीं सोएगा लेकिन शहरों में आज भी बहुत भूखे सो रहे हैं। शहर सिर्फ अच्छे दिनों का साथी है और गांव अच्छे और बुरे दोनों दिनों का, इसीलिए तो मैं हमेशा इस बात पर जोर देता हूं कि आप हमेशा याद रखें चाहे शहर में हो या गांव में “मेरा गांव, मेरी जिम्मेदारी”।
सरकार द्वारा कुछ विशेष श्रमिक ट्रेन चलाकर मजदूरों को ले आया जा रहा है। मैं सरकार से निवेदन करता हूं कि श्रमिक ट्रेनों की संख्या बहुत कम है इससे लोगों को यह विश्वास नहीं हो पा रहा है कि मेरा नंबर कब आएगा? और मैं कब घर जाऊंगा? इसलिए बहुत से मजदूर पैदल, साइकिल से या रास्ते में जो भी साधन मिल रहा है उससे घर की ओर निकल जा रहे हैं जिससे वह बेचारे मजदूर रास्ते में बहुत परेशान हो रहे हैं और उसी की वजह से अभी हमने एक बहुत बड़ी व ह्दयविरादक दुर्घटना देखी है। जिसमें 16 मजदूर मालगाड़ी से कटकर मर गए। इसलिए मैं सरकार से निवेदन करूंगा कि वह 3 से 5 दिन की जहमत उठाते हुए ट्रेनों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में चला कर इन प्रवासी मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचा दें जिससे वे न सिर्फ अपने को सुरक्षित, आत्मनिर्भर व अवसाद से मुक्त महसूस करेंगे बल्कि वे राष्ट्र को भी इस संकट के दौर में सरकारों द्वारा की जा रही उनकी चिंता से मुक्त कर देंगे।
लेखक
प्रदीप मिश्र (सामाजिक कार्यकर्ता)
प्रणेता (मेरा गांव, मेरी जिम्मेदारी)
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