उत्तर प्रदेश ( दैनिक कर्मभूमि ) जौनपुर
जौनपुर।तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय जौनपुर के हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित हिंदी कथा साहित्य में लेखिकाओं का योगदान पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन महाविद्यालय के सेमिनार हाल में आज दिनांक 31 मार्च 2021 को हुआ। “हिंदी कथा साहित्य में लेखिकाओं का योगदान बड़ा ही महत्वपूर्ण है । स्त्री लेखन का संदर्भ निजता से आरंभ होकर व्यापक जीवन जगत से जुड़ रहा है। गुणवत्ता और परिमाण दोनों ही दृष्टियों से हिंदी की महिला कथाकारों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाया है।” उक्त उद्गार उच्च शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश, प्रयागराज एवं हिंदी विभाग, तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “हिंदी कथा साहित्य में लेखिकाओं का योगदान” विषयक द्वि- दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डॉ.सुनील विक्रम सिंह ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बंग महिला की दुलाईवाली से प्रारंभ होकर महिला कथा लेखन जिस शिखर पर पहुंचा है वह निश्चय ही सराहनीय है। अपनी प्रतिभा के दम पर महिला रचनाकारों ने कथा साहित्य के क्षेत्र में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है।
इससे पूर्व कार्यक्रम के प्रारंभ में मुख्य अतिथि,प्राचार्य एवं अन्य अतिथियों ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
संगोष्ठी में बोलते हुए कालेज के प्राचार्य डॉ.समर बहादुर सिंह ने कहा कि महिला लेखिकाओं का योगदान कथा साहित्य में प्रशंसनीय रहा है। इन्होंने अपने लेखन से नई सोच और नए प्रतिमान रचे हैं।
कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत एवं बीज बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कालेज की पूर्व प्राचार्य और संगोष्ठी की आयोजन सचिव डॉ. सरोज सिंह ने कहा कि कथा साहित्य में लेखिकाओं ने नारी जीवन से जुड़े स्थूल समस्याओं की जगह मनोवैज्ञानिक भावनाओं को समझने-समझाने का प्रयास किया है। इन लेखिकाओं ने पुरुषों से भी अधिक सूक्ष्म चित्रण अनेक संदर्भों में किया है।
पूर्वांचल विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ.विजय कुमार सिंह ने स्त्री लेखन पर प्रकाश डाला।
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक डॉ. महेंद्र कुमार त्रिपाठी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि महिला लेखिकाओं ने नारी की अस्मिता की तलाश बड़ी गहराई के साथ ही है। इन्होंने समाज, राजनीति, धर्म, विज्ञान, संस्कृति, भौतिकता तथा वैश्विकता आदि को गहराई के साथ चित्रित किया है।
हिंदी विभाग की अध्यक्ष डॉ.सुषमा सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि स्त्री लेखन में मुक्ति का मार्ग तलाशती आधुनिक स्त्री जीवन के विविध पहलुओं को परत दर परत उकेरती है।
हिंदी विभाग के डॉ. राजदेव दुबे ने कहा कि महिला लेखिकाओं ने सर्जनात्मक स्तर पर अनेक निषेधों की कड़ी आलोचना करते हुए उन्हें तोड़ने के लिए कथा साहित्य में अपने अनुकूल पात्रों को गढ़ा और प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी के सह आयोजन सचिव डॉ. ओम प्रकाश सिंह ने अभ्यागत अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि महिला कथाकारों ने स्त्री चरित्रों के माध्यम से नई पहचान और अस्तित्व बोध पैदा करने का प्रयास किया है।
संगोष्ठी में सकलडीहा पीजी कॉलेज से पधारे डॉ. दयाशंकर यादव ने ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रम की सराहना की और कहा कि चौखटों का अतिक्रमण कर लेखिकाओं ने अपनी नायिकाओं को सामाजिक-राजनीतिक जीवन में स्वीकृत दी तो कथा साहित्य में संभावनाएं और प्लाट स्वयं उजागर होने लगे।
संगोष्ठी में मड़ियाहूं पीजी कॉलेज के डॉ सुरेश पाठक, डॉ रत्नेश त्रिपाठी, ज्ञानेश त्रिपाठी, नरेंद्र पाठक, मोहम्मद हसन पीजी कॉलेज की शाहिदा परवीन, इसराजी देवी महाविद्यालय से अमित श्रीवास्तव, बयालसी पीजी कॉलेज के डाॅ. चंद्र भूषण त्रिपाठी आदि तथा शोध छात्रा ज्योति सिंह, वंदना सिंह, रजनी राय, नीतिका, दीक्षा सिंह, सारिका श्रीवास्तव, अभिलाषा सिंह, संजीव,मुकेश, जितेंद्र, पूनम पांडेय ने शोध पत्र का वाचन किया।
इससे पूर्व संगोष्ठी के पहले दिन उद्घाटन सत्र में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शिवकुमार मिश्र एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के हिंदी विभाग के प्रोफेसर श्रद्धा सिंह ने अपने विचार रखे थे।
संगोष्ठी के सफल आयोजन में चंद्र प्रकाश गिरी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। महेंद्र मौर्य,रावेंद्र सिंह, लालचंद आदि का सराहनीय योगदान रहा।।
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