शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक दिवस स्वराज्य और सुशासन की विरासत….. हरिसिंह गोचर

राजस्थान राष्ट्रीय (दैनिक कर्मभूमि) छीपाबड़ौद उपखंड एवं तहसील मुख्यालय स्थित कस्बा क्षेत्र में ग्राम पंचायत ढौलम के वार्ड नंबर 5 हरनावदी जागीर की चरागाह भूमि के सामने केलखैड़ी में संचालित विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान द्वारा संचालित आदर्श विद्या मंदिर ढोलम रोड़ छीपाबडौ़द के प्रचार प्रमुख शानूप्रकाश चक्रधारी ने जानकारी देते हुए बताया कि आज प्रातः विद्यालय में हिन्दू साम्राज्य दिवस बडे़ ही उत्साह से मनाया जिसमें मुख्यवक्ता प्रधानाचार्य हरिसिंह गोचर ने बताया कि शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक, संपूर्ण हिंदूराष्ट्र के लिये एक संदेश था कि यह विजय का रास्ता है। इस पर चलो। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का प्रयोजन ही यह था। उनका उद्यम अपने लिये नहीं था। उनके अपने व्यक्तिगत कीर्ति, सन्मान के लिये सत्ता संपादन नहीं किया। उन की तो यह वृत्ति ही नहीं थी। -स्वार्थ की बात तो दूर रही शिवाजी महाराज को अपने प्राणों से भी मोह नहीं था। छत्रसाल जो आये थे देशकार्य में सेवा का अवसर माँगने, उनको उन्होंने उपदेश किया, “तुम नौकर बनने के लिये हो क्या? क्षत्रिय कुल में जन्मे तुम सेवा करोगे दूसरे राजाओं की ? अपना राज्य बनाओ।” यह नहीं कहा कि वहाँ राज्य बनाकर मेरे राज्य से जोड दो, या मेरा मांडलिक बनो तब मै मदद करूँगा। ऐसा नहीं कहा उन्होंने। क्योंकि यह उन्हें करना ही नहीं था। उनका उद्देश्य ऐसी अपनी एक छोटी जागीर, एक राज्य, सब राजाओं में अधिक प्रभावी एक राजा, ऐसा बनना नहीं था।छत्रपति शिवाजी महाराज ने 340 साल पहले स्वराज्य, स्वधर्म, स्वभाषा और स्वदेश के पुनरुत्थान के लिये जो कार्य किया है, उस की तुलना नहीं हो सकती. उनका राज्याभिषेक एक व्यक्ति को राजसिंहासन पर बिठाना इतने तक सीमित नहीं था. शिवाजी महाराज मात्र एक व्यक्ति नहीं, वे एक विचार और एक युगप्रवर्तन के शिल्पकार थे.

-भारत एक सनातन देश है, यह हिंदुस्थान है, और यहां पर अपना राज होना चाहिये. अपने धर्म का विकास होना चाहिये, अपने जीवनमूल्यों को चरितार्थ करना चाहिये. शिवाजी महाराज का जीवनसंघर्ष इसी सोच को प्रस्थापित करने के लिये था. वे बार बार कहा करते थे कि, ‘यह राज्य हो, यह परमेश्वर की इच्छा है. मतलब स्वराज्य संस्थापना यह ईश्वरीय कार्य है. मैं ईश्वरीय कार्य का केवल एक सिपाही हुँ।“
-छत्रपति शिवाजी महाराज का शासन भोंसले घराने का शासन नहीं था. उन्होंने परिवार वाद को राजनीति में स्थान नहीं दिया. उनका शासन सही अर्थ में प्रजा का शासन था. शासन में सभी की सहभागिता रहती थी. सामान्य मछुआरों से लेकर वेदशास्त्र पंडित सभी उनके राज्यशासन में सहभागी थे.छुआछूत का कोई स्थान नहीं था. पन्हाल गढ़ की घेराबंदी में नकली शिवाजी जो बने थे, उनका नाम था, शिवा काशिद. वे जाति से नाई थे. अफजलखान के समर प्रसंग में शिवाजी के प्राणों की रक्षा करनेवाला जीवा महाला था. और आगरा के किले में कैद के दौरान उनकी सेवा करने वाला मदारी मेहतर था. उनके किलेदार सभी जाति के थे।

संवाददाता कुलदीप सिंह सिरोहीया बारां छीपाबड़ौद