उत्तर प्रदेश/राष्ट्रीय दैनिक कर्म भूमि:/ भारतीय पुराणों के अनुसार लोक कल्याण एवं प्रकृति कल्याण के लिए भगवान शिव 12 स्थानों पर प्रकट हुए और लिंग के रूप में विराजमान रहे, भगवान शिव के उन 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग भी है, पुराणों के अनुसार हुई गणना के हिसाब से यह नौवां प्रमुख ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है।वैद्यनाथ मन्दिर भारतवर्ष के झारखण्ड राज्य के देवघर नामक स्थान में अवस्थित एक प्रसिद्ध मंदिर है। शिव का एक नाम ‘वैद्यनाथ भी है, इस कारण लोग इसे ‘वैद्यनाथ धाम’ भी कहते हैं। यह एक सिद्धपीठ है। इस कारण इस लिंग को “कामना लिंग” भी कहा जाता हैं। देवघर में शिव का अत्यन्त पवित्र और भव्य

मन्दिर स्थित है।पौराणिक कथाओं के अनुसार यह ज्योर्तिलिंग लंकापति रावण द्वारा यहां लया गया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण भगवान शिव का परम भक्त था, शिव पुरण के अनुसार रावण एक बार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर्वत पर जाकर शिव लिंग की स्थापना करके कठोर तपस्या करने लगा। कई वर्षों तक तप करने के बाद भी भगवान शिव प्रसन्न नहीं हुए तब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने सिर की आहुति देने का निश्चय किया तथा विधिवत पूजा करते हुए दशानन रावण एक-एक करके अपने नौ सिरों को काटकर शिव लिंग पर चढ़ाता गया जब दसवां सिर काटने वाला था तब भगवान शिव वहां प्रकट हुए और रावण को वरदान मांगने के लिए कहा। रावण को जब इच्छित वरदान मिल गया तब उसने भगवान शिव से अनुरोध किया कि वह उन्हें अपने साथ लंका ले जाना चाहता है। भगवान शिव ने सोंच विचार कर रावण से कहा कि वह उसके साथ नहीं जा सकते हैं, वह चाहे तो यह शिवलिंग (जिसकी पूजा करते हुए रावण ने अपने नौ सिर भगवान शिव को अर्पित किए थे) ले जा सकता है। शिवलिंग को ले जाते समय भगवान शिव ने रावण से कहा कि इस ज्योर्तिलिंग को रास्ते में कहीं भी भूमि पर मत रखना अन्यथा यह वहीं पर स्थापित हो जाएगा। भगवान विष्णु नहीं चाहते थे कि यह ज्योर्तिलिंग लंका पहुंचे, अत: उन्होंने गंगा से रावण के पेट में समाने का अनुरोध किया। रावण के पेट में जैसे ही गंगा पहुंची रावण के अंदर लघुशंका करने की इच्छा प्रबल हो उठी। रावण ने ग्वाले के भेषरूपी भगवान विष्णु को देखकर उन्हें शिवलिंग सौंप दिया और ज़मीन पर न रखने की हिदायत देकर लघुशंका करने चला गया, वह भगवान विष्णु रूपी ग्वाल शिव लिंग को भूमि पर रखकर विलुप्त हो गया। रावण जब लौटकर आया तब लाख प्रयास करने के बावजूद शिवलिंग वहां से टस से मस नहीं कर सका। अंत में रावण को खाली हाथ लंका लौटना जाना पड़ा। बाद में सभी देवी-देवताओं ने आकर इस ज्योर्तिलिंग की पूजा की और विधिवत रूप से स्थापित किया। यह वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मनुष्य को उसकी इच्छा के अनुकूल फल देने वाला है। यह ज्योतिर्लिंग के द्वारा दबाये जाने के कारण भूमि में दबा है तथा उसके ऊपरी सिरे में कुछ गड्ढा सा बन गया है। फिर भी इस शिवलिंग मूर्ति की ऊँचाई लगभग ग्यारह अंगुल है। सावन के महीने में यहाँ मेला लगता है और भक्तगण दूर-दूर से कांवर में जल लेकर बाबा वैद्यनाथ धाम (देवघर) आते हैं। वैद्यनाथ धाम में अनेक रोगों से छुटकारा पाने हेतु भी बाबा का दर्शन करने श्रद्धालु आते हैं। ऐसी प्रसिद्धि है कि श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की लगातार आरती-दर्शन करने से लोगों को रोगों से मुक्ति मिलती है। देवघर को देवी देवताओं का घर कहा जाता है यहां हर साल सावन में बहुत बड़ा श्रावणी मेला लगता है।बाबा बैद्यनाथ ज्योर्तिलिंग मंदिर के बगल में एक विशाल तालाब है जिसके आस पास बहुत सारे मंदिर बने हुए हैं और यहां शिव मंदिर माता पार्वती के मंदिर से जुड़ा हुआ है पुराणों के अनुसार कहा जाता है कि वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर के बाद वासुकी नाथ शिव मंदिर दर्शन किए जाते हैं जोकि देवघर से 42 किलोमीटर एक छोटे से गांव में स्थित है।वैद्यनाथ धाम झारखंड के देवधर में स्थापित एक प्रमुख ज्योर्तिलिंग मंदिर है यह देश के प्रमुख नगरों से अच्छी प्रकार से जुड़ा हुआ है यहां आप रेलमार्ग, हवाईमार्ग एवं सड़कमार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां का निकटतम हवाई अड्डा लोकनायक जयप्रकाश, पटना से 274 किमी की दूरी पर है और निकटतम रेलवे स्टेशन जसीडीह जंक्शन केवल 7 किलोमीटर की दूरी पर ही है जोकि देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।
(यह कथा शिव पुराण व पौराणिक कथाओं पर आधारित है)
रिपोर्ट: प्रदेश हेड राजेन्द्र पाण्डेय लखनऊ उत्तरप्रदेश
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