प्राइवेट शिक्षकों का शोषण: मजदूर से भी बदतर हालात, जिम्मेदार कौन?— डॉ. विजय वर्मा

राष्ट्रीय दैनिक कर्मभूमि अम्बेडकर नगर

अंबेडकरनगर भारत में शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा निजी विद्यालयों पर निर्भर है, लेकिन विडंबना यह है कि इन्हीं विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक सबसे अधिक उपेक्षित और शोषित हैं। “राष्ट्र निर्माता” कहे जाने वाले शिक्षक आज अपने ही अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। प्रदेश में निजी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की स्थिति दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती जा रही है। प्राइवेट शिक्षकों को जहां एक ओर अत्यंत कम वेतन पर कार्य करने को मजबूर किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उनके अधिकारों की अनदेखी लगातार जारी है। कई शिक्षकों का कहना है कि उन्हें एक सामान्य मजदूर से भी कम पारिश्रमिक दिया जा रहा है, जिससे उनका जीवनयापन कठिन हो गया है। संबंधित विभागों और अधिकारियों की उदासीनता इस समस्या को और गंभीर बना रही है। आरोप है कि जब तक व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं आएगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगेगा, तब तक निजी शिक्षकों की स्थिति में सुधार की उम्मीद करना मुश्किल है।

इसी क्रम में माध्यमिक शिक्षक संघ अम्बेडकर नगर के जिलाध्यक्ष एवं प्रतिनिधि शिक्षक विधायक डा. विजय वर्मा ने भी इस मुद्दे पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्राइवेट शिक्षकों के साथ हो रहा शोषण अत्यंत निंदनीय है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ द्वारा प्राइवेट विद्यालयों के शिक्षकों के लिए सेवा सुरक्षा एवं समान कार्य के लिए समान वेतन हेतु नियमावली बनाये जाने की मांग कर विगत कई वर्षो से जिला स्तर से प्रदेश स्तर तक धरना प्रर्दशन व आंदोलन कर की गई। इस मुद्दे को नेता शिक्षक दल ध्रुव कुमार त्रिपाठी द्वारा निरंतर सदन में जोरदार ढंग से रखकर सरकार को घेरा जा रहा है, कितु सरकार द्वारा अभी तक इन शिक्षको की अनदेखी की जा रही है। जिलाध्यक्ष डा.विजय वर्मा ने कहा कि यदि सरकार द्वारा जल्द ही इस पर प्रभावी कार्यवाही नहीं की गई, तो संगठन और बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होगा। इस संबंध आगामी 6 अप्रैल को संगठन के प्रमुख पदाधिकारियों की एक बैठक भी लखनऊ मे आहूत की गई है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का एक पक्ष यह भी है कि निजी शिक्षक स्वयं भी संगठित नहीं हैं, जिसके कारण उनकी आवाज प्रभावी रूप से सामने नहीं आ पाती। यदि शिक्षक एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें, तो निश्चित ही इस शोषण के खिलाफ एक मजबूत आंदोलन खड़ा हो सकता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि शासन-प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर कब तक चुप्पी साधे रहता है और कब प्राइवेट शिक्षकों को उनका उचित अधिकार दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।